बात करनी है मुझे
तन कर खड़े शिखर! तुम से
मेरे पास मजबूत कंधा है पिता का
जिस पर खड़े हो कर
तुम्हारे बराबर हो जाऊँगा मैं
मुझे टटोलने हैं वे सब झरने तुम्हारे
जो तुम्हारे सीने में बहते हों
बताऊँगा तुम्हें कि मेरी माँ के हृदय से
उन सबसे मीठे और अविरल सोते
नेह के नित नये प्रवाह गतिमान हैं
सुनो ऐ गिरिश्रेष्ट !
तुम्हारे तन पर उगे
उन गर्वीले देवदारों से भी
ऊँचे हौसले ठसाठस भर दिये हैं
मेरे अपने अपनों ने
शायद तुम्हें यह पता नहीं है !
रामनारायण सोनी
४.०७.२३
No comments:
Post a Comment